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    रेड क्रॉस स्थापना दिवस विशेष - सुनीता कुमारी, शिक्षिका

    2021-05-08

    एक ओर जहां पूरा विश्व वैश्विक महामारी कोविड-19 संक्रमण काल से गुजर रहा हैं वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सेवा भाव के साथ जुड़ कर कार्य करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था रेडक्रॉस की स्थापना दिवस मनाई जा रही हैं। जहां इस धरती पर कुछ लोग मानवता और मानव जीवन के लिए घातक और अभिशाप होते हैं। वहीं कुछ लोग मानव जाति के लिए वरदान और देवदूत बनकर इस धरती पर जन्म लेते हैं। शीर्ष के कुछ नाम ऐसे हैं, जिनके वजह से इस दूनिया में भीषण युद्ध हुए हैं तो कुछ लोगों की स्वार्थ सिद्ध की लिप्सा और महत्वकांक्षा ने पूरे देश में और विरोधी देशो में त्राहिमाम की स्थिति पैदा कर दी थीं। हजारों हजार लोगों की जान की कोई कीमत नहीं रही थीं। जिसका उदाहरण आप सभी के सामने हैं। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लाखों की संख्या में सैनिक मारे गए थे। इतना ही नही बल्कि हजारों निर्दोष लोगों ने अपनी जान भी गवाई थीं। -सामाजिक कार्यो में उल्लेखनीय योगदान के क्षेत्र में प्रतिमूर्ति के रूप में स्थापित हैं रेडक्रॉस के संस्थापक जॉन हेनरी: यह स्थिति मानवता को शर्मसार करती है और मनुष्य को सामाजिक प्राणी करने में संकोच करने पर विवश करती है। प्राकृतिक जनित आपदा से कहीं ज्यादा भयानक मानव जनित आपदा है। मानव जनित आपदा में युद्ध, दंगे, आतंकवाद, फसाद हैं। यह स्थिति पूरी दुनिया में कहीं ना कहीं बनी रहती है। जहां कुछ लोग इस विनाश का कारण होते हैं। वहीं कुछ लोग इस विनाश की लीला को देखकर इतने व्यथित होते हैं कि, समाज सेवा मानव सेवा के लिए वह अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। इन्हीं में एक नाम जॉन हेनरी डयूनेंट का है। जिन्हें याद करते हुए उनके सम्मान में स्वतः ही नतमस्तक हो जाना पड़ता हैं। अंतराष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक कार्यो में उल्लेखनीय योगदान के क्षेत्र में प्रतिमूर्ति के रूप में स्थापित जॉन हेनरी डयूनेन्ट के सम्मान में विश्व रेडक्रॉस दिवस मनाया जाता है। हर तरह के आपदा में घिरे लोगों की मदद करने वाली अंतरास्ट्रीय स्तर की संस्था रेडक्रॉस को सम्मानित करने एवं मानवता के देवदूत के रूप में सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। -जॉन हेनरी डयूनेंट की याद में मनाया जाता हैं रेडक्रॉस दिवस: इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस सोसाइटी के द्वारा पूरे विश्व में प्रतिवर्ष 8 मई को विश्व रेडक्रॉस दिवस मनाया जाता है। इस दिन जॉन हेनरी डयूनेंट का जन्म दिवस को यादगार पल बनाने के लिए भी मनाया जाता है। जॉन हेनरी एक प्रसिद्ध व्यापारी थे और वह स्विट्जरलैंड के निवासी थे। व्यापार के क्रम में ही एक बार इटली गए हुए थे। वहां जाने के बाद युद्ध की विभीषिका को देखकर काफ़ी व्यथित हो गए थे। जॉन हेनरी नामक व्यवसायी का मन इतना व्यथित हुआ कि वह मानव सेवा का प्रण ले लिया। लेकिन इसके बाद वह मानव सेवा के लिए 1863 में स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में अपने क़रीबी सहयोगियों के साथ मिलकर "रेड क्रॉस" नामक संस्था की नींव रखी। जिसका जीता जागता उदाहरण आप सभी के सामने दिख रहा हैं कि आज पूरी दुनिया अगर किसी बातों को लेकर अपनी एकजुटता का परिचय देता हैं तो उसका नाम रेड क्रॉस ही हैं। -मरीज़ों के सामने एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरी रेडक्रॉस: सशस्त्र, हिंसा, युद्ध, पीड़ित, आपदा पीड़ित व महामारी जैसे विपदा की घड़ी में लोगों तक आवश्यक मदद पहुंचाने की जिम्मेदारी इन रेडक्रॉस संस्था से जुड़े हुए समाजसेवियों की होती हैं। वहीं रेड क्रॉस का सफेद पट्टी पर बना प्लस चिन्ह मानवता का और मानव सेवा का प्रतीक माना जाता है। रेड क्रॉस मानवता, निष्पक्षता, तटस्था, स्वतंत्रता, सार्वभौमिकता और स्वैच्छिक सेवा को आधार बनाकर कार्य करता है। लगभग एक अरब 90 लाख लोग इस संस्था से जुड़े हुए हैं। पूरे विश्व के लगभग 200 देशों में यह संस्था अंतरास्ट्रीय स्तर पर जुड़ कर कार्य करती हैं। रेड क्रॉस के द्वारा खून की कमी को पूरा करने के लिए वर्ष 1937 में एक संस्था की स्थापना की गई थी। जिसके माध्यम से थैलेसीमिया, एनीमिया व कैंसर के मरीजों का इलाज हो रहा है और आम मरीजों को को भी जब खून की आवश्यकता होती है तो रेड क्रॉस ही एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने नज़र आता है। -स्थापना काल से ही उत्साहवर्धक करते आ रहा हैं रेडक्रॉस: देश की आज़ादी के एक वर्ष बाद ही 8 मई 1948 को रेड क्रॉस दिवस के रूप में पहली बार मनाया गया था। जॉन हेनरी डयूनेंट को वर्ष 1901 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वर्ष 1917, 1944 एवं 1963 में तरह-तरह के विपदाओं में बढ़ चढ़ कर सेवा करने को लेकर रेड क्रॉस को नोबेल पुरस्कार दिया गया था। रेड क्रॉस की स्थापना जब से हुई है तब से यह निरंतर उत्साहवर्धक कार्य करते आ रहा है और अभी वर्तमान में वैश्विक महामारी करोना काल में भी कर रहा है। रेड क्रॉस की महत्ता वर्तमान समय में और काफ़ी बढ़ गई है। क्योंकि देश का हर नागरिक चाहे व नेता, अभिनेता या फिर अधिकारी हो सभी लोग इस कोविड-19 के कारण जूझ रहें है। -ऑक्सीजन की कमी से नही बल्कि कालाबाजारी से हो रही मौत: वर्तमान में भारत कोरोना से लड़ाई लड़ रहा हैं। पूरा भारत चिकित्सीय अव्यवस्था से बहुत ज़्यादा व्यथित व परेशान हैं। ऑक्सीजन की कमी के कारण जितने मरीजों की मौत नहीं हो रही हैं उससे कहीं ज़्यादा ऑक्सीजन की कालाबाजारी होने व महंगे होने के कारण बहुत ज़्यादा कोविड-19 के मरीज़ काल के गाल में समा रहें हैं। देश के नामचीन अस्पतालों की कुव्यवस्थाओं पर भी भी सवालियां निशां उठने लगे हैं। देश की चिकित्सीय व्यवस्था को देखने से ऐसा लगता है कि भारत में रेड क्रॉस के समान एक और संस्था की स्थापना होनी चाहिए। जो भारत के मरीजो को बेहतर इलाज एवं चिकित्सीय सुविधाओं के अलावा अस्पताल के चिकित्सकों पर भी नजर रख सके। आम लोगों की परेशानियों को दूर कर सकें। देश के अस्पतालों या अस्पतालों की व्यवस्थाओं पर भारत का हर नागरिक संतुष्ट नहीं है। जिस कारण मरीजों का इलाज संदिग्धता के दायरे में आ रहा है। -मध्यमवर्गीय परिवार वालों को बेहतर इलाज कराना हो गया चुनौती: चिकित्सकों को भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है मगर, कुछ स्वार्थी चिकित्सकों के कारण जान बचाने वाले भगवान पर सवाल खड़े हो रहे हैं। भारत में बहुत सी नई-नई तकनीक व टेक्नोलॉजी से परिपूर्ण अस्पताल बनाये तो गए है लेकिन इन अस्पतालों में इलाज करवाना संदेह पैदा करने लगा है। क्योंकि आए दिन सुनने में आते रहता हैं कि वहां पर गलत ढंग से इलाज किया गया और अधिक रक़म की उगाही भी की गई हैं। अस्पताल में इलाजरत मृत व्यक्तियों को भी कई कई दिनों तक जानबूझकर अस्पताल में रखा गया ताकि मरीज़ों को रखने के एवज़ में अधिक से अधिक पैसे लिए जा सके। इस तरह की बातें को सुनने के बाद मन में एक अज़ीब तरह की हिलकोरे मारने लगता हैं। मानों की देश के उन भगवान रूपी राक्षसों से कैसे निबटा जाए। साधारण या मध्यमवर्गीय के बीच इलाज कराना एक तरह से चुनौती बन गया हैं। सरकारी अस्पतालों में इलाज की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध नही है। अगर है भी तो रुपये को पानी की तरह बहाने के बराबर हैं। निजी अस्पताल संचालकों के द्वारा मरीज़ों के परिजनों से बेहतर इलाज़ के लिए अगर ज़्यादा पैसे लेने की मांग की जाती हैं तो निश्चित रूप से अब वक्त आ गया है की भारत ही नही बल्कि पूरी दुनियां को रेड क्रॉस जैसी एक और संस्था की स्थापना करनी चाहिए। जो दुनियां भर में विभिन्न तरह की आपदा या बीमारियों से ग्रसित मरीज़ों के इलाज़ पर अपनी नज़र रखने के साथ ही बेहतर तरीके से सेवाभाव भी कर सकें। लेखिका जिला स्कूल पूर्णिया में हिंदी की शिक्षिका के रूप में पदस्थापित हैं