नियोजित शिक्षकों की मांगो एवम समस्याओं का निदान करने पर अपना ध्यान केंद्रित करे सरकार–प्रो०रणजीत कुमार

छपरा : जयप्रकाश विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर शिक्षक संघ के सचिव और बिहार शिक्षा मंच के संयोजक प्रो रणजीत कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग किया है कि सरकार टकराव का रास्ता छोड़कर नियोजित शिक्षकों की मांगो एवम समस्याओं का निदान करने पर अपना ध्यान केंद्रित करे।विदित हो कि बिहार के 4 लाख नियोजित शिक्षक अपनी जायज मांगो के समर्थन में तथा सरकार के हठ धर्मिता एवम शिक्षक विरोधी रवैये के खिलाफ शिक्षक दिवस के अवसर पर 5 सितम्बर 2019 को गांघी मैदान में मुँह पर काली पट्टी बांधकर धरना देगें।शिक्षक संगठनों के इस आंदोलनात्मक कार्यक्रम से घबड़ाकर शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव ने अपने पत्रांक -87 दिनांक 28-8-2019 के द्वारा शिक्षक दिवस के अवसर पर विद्यालयों को खुला रखने तथा सभी शिक्षकों को विद्यालय में उपस्थित रहने का फरमान जारी किया है।सरकार के इस रवैये से शिक्षक संगठनों एवम सरकार के बीच टकराव बढ़ता हुआ प्रतीत होता है।शिक्षक संगठनों एवम सरकार ने बीच टकराव के हालात राज्य सरकार, शिक्षकों एवम शिक्षार्थियों तीनो के लिए नुकसानदेह है।इससे बिहार की विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था का पूरी तरह से बेपटरी हो जाने की आशंका है जिससे अंततः गाँव गरीब के बच्चों का ही नुकसान दिखाई पर रहा है।विदित हो कि बिहार में जो नियोजन नियमावली लागू है वह पूरी तरह से एकपक्षीय, अपमानजनक एवम शिक्षक विरोधी है।नियोजित शिक्षकों को वाजिब वेतनमान, पेंशन, सेवांत लाभ, राज्य कर्मी का दर्जा, सावधिक प्रोन्नति, भविष्य निधि कटौती, अंतरजिला स्थानांतर आदि की सुविधा से आज तक महरुम रखा गया।बिहार के प्रत्येक जिला में 25 प्रतिशत से ज्यादा शिक्षक दूसरे जिले के हैं।सरकार द्वारा दिये जा रहे अल्प वेतन से क्या इन शिक्षकों के परिवार का भरण पोषण और बच्चों को उचित शिक्षा प्रदान करना सम्भव है?सरकार ने हर मोड़ पर इन शिक्षकों का शोषण दोहन करने का काम किया है।प्रशिक्षित शिक्षकों को भी दो साल तक अप्रशिक्षित शिक्षक वाला वेतनमान दिया गया।अनुसूचित जाति जनजाति एवम अत्यंत पिछड़े वर्ग के अप्रशिक्षित नियुक्त शिक्षकों की वरीयता योगदान की तिथि से निर्धारित न कर प्रशिक्षण प्राप्त करने की तिथि से निर्धारित किया जा रहा है जिससे कमजोर वर्ग के इन शिक्षकों की वरीयता प्रभावित हो रही है।छः माह से ज्यादा बीत जाने पर भी मैट्रिक एवम इंटरमीडिएट की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन का पारिश्रमिक आज तक शिक्षकों को भुगतान नहीं किया गया है।उत्क्रमित उच्च विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की तमाम समस्याएं यथावत है।इसी तरह राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा के केंद्र समन्वयक, मेंटर, सुपरवाइजर एवम साधनसेवी को शैक्षणिक सत्र 2017से ही मानदेय नहीं मिला है
कुल मिलाकर बिहार की शिक्षा व्यवस्था सरकार की गलत नीति और नीयत की वजह से निराशाजनक तस्वीर पेश कर रही है।अपमान बोध,टूटे मनोबल एवम मानसिक पीड़ा से गुजर रहे शिक्षकों से अपने छात्रों को सर्वोत्तम देने की अपेक्षा करना हथेली पर घास उगाने जैसा है।हाल ही में सरकार ने स्वागत योग्य कदम उठाते हुए मदरसा के शिक्षकों को वेतनमान, पेंशन आदि की सुविधा देने का निर्णय लिया है लेकिन नियोजित शिक्षकों के साथ इस प्रकार का वर्ताव कर रही है जैसे वे सरकार के दुश्मन हों।शिक्षक संगठनों एवम सरकार के बीच संवादहीनता लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।शिक्षक दिवस के अवसर पर यदि पटना के गाँधी मैदान में शिक्षक संगठनों द्वारा अपनी मांगों के समर्थन में मौन धरना दिया जाता है तो राज्य सरकार की देश दुनिया में बदनामी तय है।इसलिए समय रहते सरकार द्वारा अविलंब शिक्षक संगठनों से वार्ता कर शिक्षकों की वाजिब माँगो को मान लेने से सरकार की छवि एवम लोकप्रियता दोनों में इज़ाफ़ा ही होगा।शिक्षक समाज सरकार की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।वक़्त के नज़ाकत को समझते हुए सरकार नियोजित शिक्षकों के हित में जल्द से जल्द सकारात्मक कदम उठाएगी जिससे शिक्षित बिहार विकसित बिहार का सरकारी नारा धरातल पर साकार हो सके।

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